यदि आप सरकारी नौकरी के लिए किसी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं तो आपके लिए कुछ चीजें जानना और कुछ सावधानियां बरतना बेहद जरूरी है। इस लेख के द्वारा मैं ऐसे ही पांच सूत्र आप लोगों  के साथ साँझा करना चाहती  हूँ। 



पहला सूत्रअखबार जवाबों के लिए नहीं बल्कि सवालों के लिए पढ़ें। आम तौर पर विद्यार्थी अखबार पढ़कर छपी हुई खबरों से अपने नोट्स तैयार करते हैं। यहाँ सावधानी बरतने की जरूरत है। समाचार पत्रों में कई बार सूचनाएं सतही होती है। इन पर आधारित नोट्स प्रतियोगी परीक्षा की दृष्टि से कदापि पर्याप्त नहीं माने जा सकते। विद्यार्थियों को चाहिए की वो अखबार से प्रमुख विषयों -सम सामयिक राजनीतिक आर्थिक परिदृश्य,ज्ञान विज्ञान, खेल इत्यादि- की सूची तैयार करें।  इसके बाद इन विषयों पर गहन ज्ञानार्जन के लिए पत्रिकाओं तथा इंटरनेट का प्रयोग करें और इस समुचित जानकारी को नोट्स का रूप देकर भविष्य में सन्दर्भ के लिए एकत्र करें।  कहने का तात्पर्य  यह है कि समाचार पत्रों में वो सवाल खोजें जिनके जवाब आपको आने चाहिए, वो विषय सूचिबद्ध करें जिनके बारे में आपको जानकारी होनी चाहिए और तत्पश्चात इंटरनेट की शरण बेहिचक स्वीकार करें। अवसर प्राप्त होने  पर भविष्य में इस विषय पर मैं आपके साथ और चर्चा करूँगी।  


दूसरा सूत्रकिसी विषय विशेष के प्रेम पाश में न पड़ें।  प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता के लिए विद्यार्थियों को कई विषयों में ज्ञानार्जन करना होता है।  किसी भी विद्यार्थी के लिए सभी विषय निसंदेह एक समान रुचिकर नहीं होते। सामान्यतः अपनी रूचि के विषय को विद्यार्थी अपने अध्ययन समय का तुलनात्मक दृष्टि से एक बड़ा भाग आवंटित करता है। विषय विशेष का ये प्रेम भोले विद्यार्थी के लिए तब खतरनाक सिद्ध होता है जब परीक्षा की घडी पास आ जाती है और एक दिन अचानक वह  पाता है कि अभी तो दुसरे विषयों का बहुत बड़ा भाग उसने छुआ तक नहीं है! इस स्थिति से बचने का सरल उपाय है 'योजना बद्ध अध्ययन'।  परीक्षा में जिस विषय के लिए जितने अधिकतम अंक निर्धारित हैं, तैयारी के लिए उपलब्ध समय को उसी अनुपात में बाँट लेना चाहिए। इसके पश्चात्, अपने मजबूत विषयों को आवंटित समय से कुछ समय निकालकर अपने कमजोर विषयों के खाते में डाल दें।  इस प्रक्रिया से प्राप्त 'सांकेतिक विषयवार समय- आवंटन सूची' का तैयारी के दिनों में सदैव सम्मान करें। जैसे ही भटकाव अनुभव हो तुरंत संभल जाएं।  


तीसरा सूत्रमित्रों से चर्चा करें, बहस नहीं।  परीक्षा की तैयारी में मित्रों से बातचीत एवं चर्चा का विशेष महत्व है। इससे हमें नए विषयों के बारे में तो जानने को मिलता ही है, इसके साथ ही हमारे विचारों में संतुलन भी विकसित होता है जो की विशेषतः साक्षात्कार में बहुत महत्व रखता है।  परन्तु ऐसा देखा जाता है कि विद्यार्थी अक्सर चर्चाओं के दौरान व्यर्थ बहस करने लगते हैं। अपने विचारों को श्रेष्ठ सिद्ध करने की होड़ सी लग जाती है जिससे समय की बर्बादी होती है और साथ ही विचारों में संतुलन की जगह एक तरह का अतिवाद प्रखर होने लगता है।  यह घातक है और विद्यार्थियों को इससे बचना चाहिए। विचारों के सरल आदान प्रदान का प्रयास करें और दृष्टिकोण 'सीखने' का रखें न की 'सीखाने' का।    

चौथा सूत्र-  भय मुक्त हों।  कई बार होनहार विद्यार्थी अत्यंत परिश्रम के बाद भी सफलता से सिर्फ इसलिए दूर रह जाते हैं क्योंकि परीक्षा के दिन आत्मविश्वास की कमी एवं असफलता के भय के कारण  वे परीक्षा में अपना श्रेष्ठ नहीं दे पाते।  इस प्रकार मन की दुर्बलता एक लम्बे समय के परिश्रम को व्यर्थ कर देती है। अतः विद्यार्थियों को चाहिए कि अपना आत्मविश्वास कभी काम न होने दें।  तैयारी काम या ज्यादा जितनी भी हुई ठीक है- परीक्षा के दिन अपनी तैयारी का मूल्यांकन करने न बैठ जाएं और न ही दूसरों से अपनी तुलना करें। असफलता से भी भय न खाएं। परीक्षा के दिन पूरा ध्यान प्रश्न पत्र पर रखें  और अर्जित ज्ञान के आधार पर श्रेष्ठ उत्तर लिखने का प्रयास करें। कोई प्र्श्न कठिन है तो जितना बने उतना बनाकर अगले प्रश्न की ओर बढ़ जाएं।  उन दो या तीन घंटों के दौरान निराशा को अपने मन में बिलकुल भी न आने दें। यहाँ ये भी उल्लेखनीय है की जब सारे प्रश्न सरल लग रहे हों, और मन बल्लियां उछल रहा हो, तब भी सतर्क हो जाने की आवश्यकता है। कहने का तात्पर्य यह है कि परीक्षा की अवधि में न निराशा उचित है और न ही उल्लास। फोकस सिम्पली ऑन परफॉरमेंस! 


पांचवा सूत्र- त्याग अनिवार्य है। सफलता किन्हीं सूत्रों को दोहराने भर से नहीं मिलती। वस्तुतः इसका कोई शार्ट कट नहीं है। ये अनिवार्यतः कीमत मांगती है। जितनी बड़ी सफलता उतनी बड़ी कीमत। और ये कीमत है त्याग- नींद का, फिल्मों का, मित्रों के साथ पार्टी का, टीवी का, इत्यादि। वस्तुतः हर विद्यार्थी इस बात को भली भांति समझता है, तब भी कई बार कीमत के भुगतान में कंजूसी हो ही जाती है। इसके दो मुख्य कारण होते हैं- अति-आत्मविश्वास तथा अनुशासन-हीन इन्द्रियाँ। सतर्क रहें। 

मुझे उम्मीद है कि स्वानुभव आधारित इस लेख से विद्यार्थियों को अवश्य लाभ होगा। शुभकामनाओं सहित।  




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