हाँ मैंने ज़िन्दगी में भूल की है...अपनों को ही अपना मानने की ।
मैं अपनों को ही अपना मानता रहा और ज़िन्दगी में बर्बाद भी होता रहा ।
जिनको मैंने अपना समजता था वो कभी अपने थे ही नहीं 
अपनेही अपनों से दूर होते गए और दूरियां भी बढ़ाते गए ।
अपने कब पराये हो गए यह तो मैं समझा ही नहीं 
हाँ मै ज़िन्दगी मै भूल करता रहा और बर्बाद भी होता रहा ।
 
मेरे हर जवाब पर उनोह्णे सवाल उठाये पर मेरे हर सवाल को दरकिनार कर दिया गया ।
अगर मुज़पर यकींन ही नहीं था तो फिर सवाल पूछे ही क्यों? 
वैसेभी मेरे जवाब देने से कोई फरक नहीं पड़ता |
हाँ मै ज़िन्दगी मै भूल करता रहा और बर्बाद भी होता रहा ।

अपनों को ही अपना मानकर मैंने मेरे कई राज उन्हें बताये थे |
मगर क्या पता था इस जालिम दुनिया के वे सारे घिनोने खिलाडी थे | 
मेरे बताई किस्सों से मुझे ही ताने पड़ने लगे |
तब जाकें मै समजा हाँ भाई भूल तो हुयी है अपनों को ही अपना मानने की |

अपनों से ही पराये होने की सफर में दुःख तो इस बात के है 
की पता है की ज़िन्दगी बर्बाद कर रहा हूँ 
पर जरा सा मलाल भी नहीं | 
क्योंकि मेने अपनों को कभी पराया समझा ही नहीं ॥





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